हरी खाद के प्रयोग ले अब खेती-किसानी के तरीका बदलत हे। एमा खरचा कम ,फायदा जादा अउ हमर खेत के माटी तको तंदुरुस्त रहिथे।
रईपुर. छत्तीसगढ़ म खेती-किसानी के पारंपरिक तरीका ह अब तेजी ले बदलत हे। रायगढ़ जिला म हरी खाद वाली खेती किसान मन बर एक बने अउ टिकाऊ रद्दा बन के आगू आवत हे। ए तरीका ले जहां माटी के उपजाऊ शक्ति ह जुग-जुग बर बनी रहिथे, ओहिच डहार किसान मन ल कम खरचा म जादा मुनाफा तको मिलत हे।
लैलूंगा विकासखंड के प्रगतिशील किसान जतिराम भगत ह ए बदलाव के बड़े मिसाल हवें। ओमन पिछले 22 बछर ले जैविक अउ हरी खाद ले खेती करत हें। जतिराम के कहना हे कि सुरु म उत्पादन थोकिन कम लग सकथे, फेर धीरे-धीरे जब माटी के गुन ह सुधरथे, त फसल ह हमेसा बर बने अउ थिर हो जाथे। ए बछर ओमन 2 एकड़ म ‘श्री विधि’ अउ ‘लाइन कतार’ पद्धति ले खेती करीन, जेमा ओ मन ल प्रति एकड़ लगभग 15 क्विंटल धान अउ 9 क्विंटल चाऊर मिलिस। ओ मन के प्रति एकड़ खरचा 15 ले 20 हजार रुपय आइस, जबकि सुध मुनाफा लगभग 80 हजार रुपय तक पहुचिस।
कृषि विभाग के मुताबिक, खरीफ सीजन ले पहिली 15 मई के बाद हरी खाद बोय के सही बखत होथे। ढैंचा, सनई अउ मूंग जइसन फसल मन ल 45-50 दिन के बाद खेत म ही जोत के मिला देय ले माटी म जैविक पोषक तत्व बढ़ जाथे अउ रासायनिक खाद के जरूरत कम परथे।
लैलूंगा म हरी खाद बर किसान मन के उत्साह तेजी ले बढ़त हे। विभाग ह ए बछर 2000 एकड़ म हरी खाद बोय के लक्ष्य रखे हे। अब किसान मन “यूरिया-डीएपी छोड़बो, हरी खाद बुआई करबो” के संकल्प लेके खेती म नवा दिसा तय करत हें।