भटगांव के जेवरा दाई: छःमासी रात के रहस्य, सारंगढ़ ले लड़ाई अउ एक दिन के मेला
जेवरा दाई के ऐतिहासिक कथा: देवसागर म हिंगलाज माता अउ राज-परिवार के परंपरा
एक दिन के मेला अउ रात के सुन्नापन: जेवराडीह म बिराजे जेवरा दाई के अनसुलझे रहस्य
- अशोक पटेल “आशु”, तुस्मा, शिवरीनारायण
छत्तीसगढ़ महतारी के पावन भुइयां अउ इहां के माटी के महिमा अगाध हे। जब-जब छत्तीसगढ़ के बात आथे, त इहां के धर्म-कर्म, रीति-रिवाज, आस्था-विश्वास, लोक-कला, तीज-तिहार अउ मेला-मड़ई के चित्र मन म उभर जाथे। इहां के जनजीवन म सामाजिक अउ सांस्कृतिक एकता के अइसन समरस रूप देखे ल मिलथे कि मन गदगद हो जाथे। पुरखा मन के नेंग-जोग अउ धरोहर ल संजोए खातिर इहां बछर भर कोनो न कोनो तिहार चलत रहिथे। हरेली ले जउन तीज-तिहार के सिलसिला सुरू होथे, वो अउर-अउर परब ले होत हुए नवरातर अउ मेला-मड़ई म जाके बिसराम लेथे। अइसने एक ठन पावन अउ आस्था ले भरे नवरातर मेला के बात हमन आज करबो।
देवसागर म बिराजे हे जेवरा दाई (हिंगलाज माता)
सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला के भटगांव नगर पंचायत ले दक्खिन डहर 3 किलोमीटर के दूरी म एक ठन सुग्घर गांव बसे हे— देवसागर। इही गांव म माता जेवरा दाई बिराजमान हे, जेला हिंगलाज माता के नांव ले घलो जाने जाथे। माता के महिमा अपरमपार हे। मान्यता हे कि इहां जउन घलो भक्त ससद्धा-भाव ले अर्जी-विनती करथे, ओकर सबो मनोकामना दाई ह पूरा करथे। इहां मन्नत पूरा होय म बलि प्रथा के रूप म कुकरी अउ बोकरा के भोग लगाए के परंपरा घलो हावय।

एक दिन के मेला अउ रात के सुन्नापन के रहस्य
माता के दरबार म हर बछर चैत पुन्नी के दिन झमाझम मेला भराथे। ए मेला के सबले बड़े खाशियत ए आय कि एहर सिर्फ एक दिन के होथे। एकरे सेती दूर-दूर ले लोट मारत अउ पैदल रेंगेइया श्रद्धालु मन एक दिन पहिली ले ही इहां पहुंचना सुरू कर देथें।
दिन ढले के पहिली वापसी: मेला म दिन भर भारी भीड़ रहिथे, फेर संझा होय के पहिली सबो दरसनरथी अपन-अपन घर डहर लौट जाथें। सांझ-मुंधियार होत ले ओ पूरा जगह सुन्ना अउ सांय-सांय हो जाथे। एकर पाछू अइसन मान्यता हे कि रात के मुंधियार म दाई ह अपन भ्रमण म निकरथे। अइसे बेरा म यदि कोनो जीव-जंतु या मनखे के आमना-सामना माता ले हो जाथे, त ओकर बचना मुसकिल हो जाथे।

कइसे पड़िस ‘जेवराडीह’ गांव के नांव?
जेवरा दाई (हिंगलाज माता) के मूल निवास देवसागर के तीर म बसे गांव जेवराडीह ल माने जाथे। माता जेवरा के नांव ले ही ए गांव के नांव ‘जेवराडीह’ पड़िस। ए माता के संबंध म गांव के निवासी नरेश पटेल जी ह एक ठन बड़ रोचक अउ प्राचीन कथा बताथें:
सपना अउ रुख-राई के चिनहा: प्राचीन काल म जेवरा दाई ह जेवराडीह म साक्षात् बिराजित रिहिन। एक बेर दाई ह कोनो गांव के एक ठन किसान ल सपना दिस अउ कहिस कि, “तैं आ अउ मोर सेवा कर।” किसान ह पूछिस— “दाई, तैं कोन जगह म बिराजित हस?” माता ह अपन ठउर के चिनहा बतावत कहिस— “मैं जेवराडीह गांव म मूरती के रूप म बिराजित हंव। मोर तीर म कोसम, कुर्रू, कया, सेनहा, चौधरी, खम्हार, दंतारा, चोरधाड़ के रुख हावय।”
बिहनिया उठ के किसान ह दाई के खोज म देवसागर पहुंचिस। उहां के मनखे मन ओला जेवरा दाई के बारे म त बताईस, फेर दाई के बताए वो सबो रुख उहां नइ मिलिस। जब ओ किसान खोजत-खोजत तीर के जेवराडीह गांव पहुंचिस, त उहां दाई के बताए जम्मो रुख राई मिलगे। दाई के साक्षात् परमान पा के किसान ह आत्मविभोर होगे अउ माता के सेवा म लग गे।

छःमासी रात के लड़ाई अउ दाई के थपना
जेवरा दाई के मूरती ल लेके इतिहास म एक ठन बड़ रोचक घटना घटे हे। पटेल जी बताथें कि:
- प्राचीन काल म सारंगढ़ के राजा ह बइला-गाड़ी म जेवरा दाई के मूरती ल ‘छःमासी रात’ (छः महिना के बरोबर लंबी रात) म चोरी-छुपे अपन राज लेगे के उदिम करिस।
- उही रात म जेवरा दाई ह भटगांव के जमींदार ल सपना दिस। जमींदार ह सपना पाके गांव वाले मन ल संगे म लेके निकर गे।
- भटगांव के जमींदार अउ सारंगढ़ के राजा के बीच गांव ले बाहिर एक ठन पथर्रा (पठार) म भारी लड़ाई-झगड़ा होइस। (इही पठार ल आज देवसागर कहे जाथे)।
- लड़ाई म सारंगढ़ के राजा ह माता के मूरती पूरा त नइ लेगे सकिस, फेर नाक अउ नथनी ल तोड़े म अउ अपन संग लेगे म सफल होगे।
- दाई के मस्तक (सिर) इही जगह म माढ़ गे अउ तब तक छःमासी रात सिरा गे। ओकर बाद ले दाई ह देवसागर म ही बिराजमान हे।
राज परिवार के पूजा परंपरा: इही घटना के कारन, आज भी चैत पुन्नी के दिन सारंगढ़ के राजा मन अपन राजमहल म दाई के नाक-नथनी के पूजा करथें। दूसर डहर, देवसागर म बिराजे माता के पहिली पूजा भटगांव रियासत के राज परिवार के मनखे मन करथें। एकर बाद ही गांव अउ दूर-दूर ले आय आम श्रद्धालु मन के पूजा-पाठ सुरू होथे।

हिंगलाज माता के पउराणिक मान्यता
इहां जेवरा दाई ल हिंगलाज माता मान के पूजे जाथे। हिंगलाज के मतलब माता दुर्गा या देवी के स्वरूप आय। पउराणिक कथा के अनुसार:
- जब माता सती ह अगन कुंड म आत्मदाह कर लिस अउ भगवान शंकर ह ओकर पार्थिव शरीर ल धर के तांडव करत रिहिन, तब संसार ल बचाए बर भगवान विष्णु ह अपन सुदर्शन चक्र चलाय रिहिन।
- चक्र ले माता सती के शरीर के अलग-अलग हिस्सा कट के धरती म गिरिस, जेला ‘शक्तिपीठ’ कहे जाथे।
- मान्यता हे कि माता सती के ब्रह्मरंध्र (सिर के हिस्सा) इहां (हिंगलाज) गिरे रिहिस।
इही सती के अंश अउ हिंगलाज स्वरूप के सेती, जेवरा दाई के दरसन बर मनखे मन म अगाध सरद्धा हावय अउ इहां के कण-कण म माता के चमत्कार महसूस होथे।