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हरेली परब म विशेष: खेती -किसानी ले जुड़े तिहार हरे हरेली

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August 4, 2024 4 Mins Read
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  • ओमप्रकाश साहू” अंकुर” सुरगी, राजनांदगांव

हमर छत्तीसगढ़ हा कृषि प्रधान राज्य हरे. हमर प्रदेश के किसान मन धान के खेती जादा करथे. एकर सेति छत्तीसगढ़ ला धान के कटोरा कहे जथे. इहाँ के कतको तिहार बार हा खेती किसानी ले जुड़े हवय. अक्ती तिहार हा धान बोवाई के संकेत हरय ता हरेली परब हा धान के सुग्घर हरियरपन दिखे के प्रतीक हरय.

हरेली तिहार हा सावन अमावस मा मनाय जथे. आषाढ़ मा किसान हा धान बोवाई के काम चालू कर देथे. जउन किसान मन के पास खुद के पास बोर, नदी, डेम ले पानी मिले के आसा नहिं रहय वोमन बोयता पद्धति ले धान बोथे. आज कल खेती किसानी मा बइला फंदाय नांगर के प्रयोग एकदम कम होगे हे. आज कल हर काम हा जल्दी मा होवत हवय. नांगर के जगह ला अब ट्रेक्टर हा ले डरे हवय. अब बहुत कम किसान मन हा बइला रखे हवय. खेत मा बइला अउ नांगर ला देखे बर आँखी तरस जथे. अइसे लगथे धीरे ले नांगर हा नंदा जही. पहिली बइला ला फांद के दंतारी अऊ पाटा चलाय जाय. अब ये सब ला ट्रेक्टर हा कर देथे.

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जउन किसान मन के पास हाथ मा पानी रहिथे. बोर, नदी, बांध ले पानी खींच के पलो डलथे. अइसन किसान मन हा परहा पद्धति ले धान बोथे. एकर बर पहिली ले खेत के कोनो भी जगह धान के थरहा लगा देय रहिथे. जब थरहा हा लगाय के लइक हो जथे ता खेत ला बढ़िया जोत – मंताके ,पाटा मा बरोबर करके परहा लगाया जथे. अभी ए काम ला बनिहार मन हा करत हवय. का पता कल जाके यहू काम ला घलो सिरिफ मशीन हा करे ला लग जही.

आज कल आधुनिक तरीका ले खेती होवत हवय. पहिली गोबर खातू के उपयोग जादा करय. अब बहुत साल होगे हे रासायनिक खाद यूरिया, डीएपी, पोटास के गजब उपयोग करे जथे. बन ला मारे बर निंदानाशक दवा के छिड़काव करे जथे. बनिहार मन के काम हा कम होवत जावत हवय तभो ले बनिहार नहिं मिलय. खेती किसानी करे मा बनिहार के समस्या हा गहरात जावत हवय. एक दू रुपया किलो चऊंर के सुविधा अउ खेती किसानी काम के प्रति लोगन मन के उदासीनता हा एकर प्रमुख कारण हरय.

आवव अब हरेली तिहार के बात करथन. ये तिहार हा अइसे समय मा मनाय जथे जब खेत मा धान के फसल हा लहलहाय ला लग जथे. बोयता पद्धति के धान के बियासी हो जथे. कुछ बचे घलो रहिथे. वइसने परहा पद्धति के धान हा घलो सुग्घर ढंग ले पोठ दिखे ला लगथे.

ये तिहार ले किसान मन के संगे संग बइला -भईंसा के थके हरे जांगर ला सुसताय ला मिल जथे. खेती किसानी मा कट -कट काम करे ला पड़थे. खेती अपन सेती कहे गेहे. ये तिहार मनाय से किसान, बनिहार मन ला कम से कम एक दिन आराम मिल जाथे. ए समय खेती किसानी मा प्रयोग होने वाला अवजार नांगर -बख्खर, पाटा, दंंतारी, रापा, कुदारी, गैंती, टंगिया, बसुला, भंवारी, हंसिया, साबर, तुतारी अउ अब नवा जमाना मा ट्रेक्टर, टिपर, हार्वेस्टर के पूजा करे जथे. घर के दुवार मा सुग्घर ढंग ले मुरमी डाल के ये अवजार मन ला रखे जथे. अब दुवार मा घलो पथरा लग गेहे ता कतको मन मुरमी नहिं डोहारय. सुग्घर ढंग ले किसान परिवार हूम -धूप , फूल, दीया, अगरबत्ती के उपयोग कर पूजा करथे. पिसान के लेप बनाके जम्मो अवजार मा लगाथे.
चीला चढ़ाय जथे. पशु धन बइला, गाय, भईंसा के पूजा करे जथे.

ए दिन राउत मन गाय, बइला, भईंसा ला जड़ी बूटी से बने दवई खिलाथे. साथ मा किसान मन घलो आटा से बनाय लोंदी जउन में नून घलो डलाय रहिथे. येला पशु धन ला खिलाथे. बरसात मा पशु धन के बीमार पड़े के संभावना जादा रहिथे. जड़ी बूटी अउ लोंदी हा हमर पशु धन के रोग प्रतिरोधक क्षमता ला बढ़ाथे अउ स्वस्थ रखथे. किसान मन राउत ला चांवल, दाल, नमक, मिर्च अउ जउन बन पड़े भेंट करथे.

हरेली तिहार के दिन लोगन मन मा गजब उछाह रहिथे. घरो घर चीला, बरा, सोहारी, भजिया, अरसा, कटवा रोटी चुरथे. अपन घर परिवार अउ अड़ोस पड़ोस ला खाय बर बुलाथे. एकर ले मेल मिलाप अउ आपस मा भाई चारा के भावना हा बढ़थे. लईका मन के संगे संग बड़का मन घलो गेंड़ी मा चढ़ के मजा लेथे . पहिली गाँव के गली मा गजब चिखला रहय. एकर से बचे बर गेड़ी हा काम आय.

आज कल अब गली के क्रांकीटीकरण होगे हवय. अउ कतको जगह होना बाकी हवय. कतको जगह गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता होथे. अउ तरह तरह के ग्रामीण खेल कबड्डी, रस्सा खींच, मटका फोड़, फुगड़ी, बिल्लस, कुर्सी दौड़ के आयोजन होथे. आजकल सरकार द्वारा घलो छत्तीसगढ़िया ओलंपिक के शुरूआत हरेली तिहार ले करे जाथे. ग्रामीण मन गाँव के मैदान मा सकलाके एक दूसर ले मिलथे जुलथे अउ सुख दुख के गोठ गोठियाथे. हरेली तिहार मा सबो झन मा अब्बड़ उछाह रहिथे। ये तिहार ह हमर कृषि संस्कृति के प्रतीक हरे।

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