बिहान से बदली ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी, खेती और व्यवसाय से लिख रहीं आत्मनिर्भरता की कहानी
स्व-सहायता समूहों से मिला बचत और ऋण का सहारा, कल्पना सिंह और मति बाई जैसी महिलाएं बनीं ‘लखपति दीदी’
रायपुर, कभी घर की जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली ग्रामीण महिलाएं अब खेती, पशुपालन और छोटे व्यवसायों के जरिए अपनी अलग पहचान बना रही हैं। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़े स्व-सहायता समूहों ने महिलाओं को बचत, ऋण और प्रशिक्षण के जरिए आजीविका बढ़ाने का अवसर दिया है। मेहनत और मिले अवसरों के सहारे कई महिलाएं अब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के साथ परिवार के फैसलों में भी अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं।
बिहान के स्व-सहायता समूहों से जुड़कर महिलाओं ने अपनी जरूरत और स्थानीय संसाधनों के अनुसार अलग-अलग काम शुरू किए। किसी ने सब्जी उत्पादन को आय का जरिया बनाया तो किसी ने मुर्गी पालन, खेती और अन्य गतिविधियों को व्यवसाय में बदला। नियमित बचत और समूह के माध्यम से मिलने वाले ऋण ने इन महिलाओं को छोटी शुरुआत से आगे बढ़ने का रास्ता दिया।
डेढ़ लाख के ऋण से खेती, अब बाजार तक पहुंचीं कल्पना
अंबिकापुर विकासखंड की कल्पना सिंह ने स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद कृषि कार्य के लिए करीब डेढ़ लाख रुपए का ऋण लिया। उन्होंने खीरे की खेती से शुरुआत की और बाद में बैंगन, टमाटर, तरबूज सहित मौसम के अनुसार दूसरी फसलों और सब्जियों का उत्पादन भी शुरू किया। खेती से आय बढ़ने के साथ उनके आत्मविश्वास में भी बदलाव आया। जो कल्पना पहले लोगों से बातचीत करने में संकोच करती थीं, अब बैंकिंग, बाजार और कृषि से जुड़े काम खुद संभाल रही हैं।
मजदूरी से मुर्गी पालन के व्यवसाय तक पहुंचीं मति बाई
उदयपुर विकासखंड के सोनतरई गांव की मति बाई ने भी स्व-सहायता समूह के सहारे अपनी आजीविका को नई दिशा दी। परिवार की आर्थिक जरूरतों के बीच उन्होंने राधा स्व-सहायता समूह से जुड़कर करीब तीन लाख रुपए का ऋण लिया और मुर्गी पालन शुरू किया। मेहनत और निरंतर प्रयास से उनका व्यवसाय आगे बढ़ा। मति बाई के अनुसार, इससे उन्हें सालाना करीब दो से तीन लाख रुपए की शुद्ध आय हो रही है। अब परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है और बच्चे भी इस काम में सहयोग करते हैं।
‘लखपति दीदी’ की पहचान बनी आत्मनिर्भरता का प्रतीक
इन महिलाओं के लिए ‘लखपति दीदी’ बनना सिर्फ आय बढ़ने तक सीमित उपलब्धि नहीं है। इसके साथ उनमें बैंकिंग, बाजार और आर्थिक निर्णयों को लेकर आत्मविश्वास भी बढ़ा है। वे परिवार के खर्च में योगदान देने के साथ बच्चों की शिक्षा, घरेलू जरूरतों और भविष्य की योजनाओं में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
बिहान के स्व-सहायता समूह महिलाओं को कृषि, सब्जी उत्पादन, पशुपालन, मुर्गी पालन, दुग्ध व्यवसाय, सिलाई सहित कई आजीविका गतिविधियों से जोड़ रहे हैं। समूह की बैठकों, प्रशिक्षण और आपसी सहयोग से महिलाओं को सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है। यही सामूहिकता उन्हें आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सहारा दे रही है।
ग्रामीण महिलाओं की ये कहानियां दिखाती हैं कि जब बचत, ऋण, प्रशिक्षण और मेहनत एक साथ जुड़ते हैं तो छोटे प्रयास भी परिवार की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। कल्पना सिंह और मति बाई जैसी महिलाएं आज अपनी आय के साथ अपने फैसले लेने का आत्मविश्वास भी बढ़ा रही हैं। सेवा संकल्प अभियान के तहत सामने आ रही ये कहानियां ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की बदलती भूमिका और आत्मनिर्भरता की तस्वीर पेश करती हैं।