छत्तीसगढ़ के शहरों की बदलेगी तस्वीर: ‘प्रगति-50’ योजना में रायपुर और बिलासपुर शामिल, जानिए क्या है पूरा प्लान
रायपुर/बिलासपुर: केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी पहल ‘प्रगति-50’ के तहत देश भर के 50 प्रमुख शहरों को संपूर्ण स्वच्छता का राष्ट्रीय मॉडल बनाने की योजना शुरू हो चुकी है। इस खास फेहरिस्त में छत्तीसगढ़ के दो सबसे बड़े नगर निगमों—रायपुर और बिलासपुर को शामिल किया गया है। केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्री की इस योजना में राज्य के उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने वर्चुअली शिरकत की।
यह पहल केवल झाड़ू लगाने या कचरा उठाने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री के विजन के अनुरूप ठोस एवं तरल कचरे के 100 प्रतिशत वैज्ञानिक प्रबंधन का दीर्घकालिक खाका है।
योजना के मुख्य बिंदु और उद्देश्य
- सोर्स सेग्रीगेशन और प्रोसेसिंग: घरों से निकलने वाले गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र करना और आधुनिक तकनीक से री-साइक्लिंग करना।
- गंदे पानी का शुद्धिकरण: सीवेज और ड्रेनेज के पानी को साफ कर दोबारा उपयोग योग्य बनाना।
- सख्त निगरानी: सार्वजनिक शौचालयों, बाजारों और मुख्य सड़कों की सफाई पर डिजिटल और सख्त नजर।
- अनुकरणीय मॉडल: रायपुर और बिलासपुर को ऐसा मॉडल बनाना, जिसे बाद में राज्य के अन्य शहरी निकायों में भी लागू किया जा सके।
छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों की जमीनी हकीकत और चुनौतियाँ
- रायपुर और बिलासपुर: राजधानी रायपुर में रोजाना करीब 550 टन और बिलासपुर में 150 टन कचरा निकलता है। रायपुर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और प्रोसेसिंग यूनिट होने के बावजूद सघन बस्तियों में शत-प्रतिशत सेग्रीगेशन एक चुनौती है। वहीं, बिलासपुर में कछार डंपिंग साइट का वैज्ञानिक निपटान और अरपा नदी में जाने वाले गंदे पानी का उपचार अधूरा है।
- दुर्ग-भिलाई (औद्योगिक अपशिष्ट): भिलाई के टाउनशिप क्षेत्र में सफाई बेहतर है, लेकिन पटरी पार की कॉलोनियों और भिलाई-चरोदा में व्यवस्था बेपटरी है। औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाले भारी रासायनिक कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए अत्याधुनिक संसाधनों की कमी है।
- अंबिकापुर का संघर्ष: कभी देश भर में ‘एसएलआरएम मॉडल’ और ‘स्वच्छता दीदियों’ के लिए प्रसिद्ध अंबिकापुर आज फंड की कमी, मानदेय विवाद और उपकरणों के अभाव के कारण अपनी व्यवस्था संभालने के लिए जूझ रहा है।
- राजनांदगांव और कोरबा: कोरबा में हसदेव नदी के पास फ्लाई ऐश और औद्योगिक नाले बड़ी समस्या हैं, जबकि राजनांदगांव में मोहारा इंटेकवेल और नालों के पानी का वैज्ञानिक उपचार न होना पेयजल के लिए खतरा बन रहा है।
भारी-भरकम वित्तीय खर्च और जनता की जेब पर असर
प्रगति-50 के तहत अगले तीन वर्षों में लगभग 1200 करोड़ से 1500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
- केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी: केंद्र सरकार से 50-60% मदद मिलने के बाद, 500 करोड़ से अधिक की राशि राज्य सरकार और निकायों को जुटानी होगी।
- यूजर चार्ज में बढ़ोतरी: निगमों की परिचालन लागत बढ़ने से स्वच्छता उपकर (User Charge) में 20 से 40% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। आम घरों का मासिक शुल्क 120 से 150 रुपये तक पहुँच सकता है, जबकि व्यावसायिक प्रतिष्ठानों (होटल, मॉल, दुकानें) के लिए यह शुल्क दोगुना तक हो सकता है। कचरा अलग न देने पर स्पॉट फाइन की सख्ती भी बढ़ाई जाएगी।
प्रभावी निगरानी और जनसहयोग ही सफलता की कुंजी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नए टेंडर या गाड़ियां खरीदने से बदलाव नहीं आएगा। जब तक सफाई अमले की बायोमेट्रिक और जीपीएस आधारित रियल-टाइम मॉनिटरिंग नहीं होगी, तब तक जमीन पर सुधार नहीं दिखेगा। साथ ही, नागरिकों को भी अपनी सोच बदलकर घरों के स्तर पर कचरा अलग करने को दैनिक आदत बनाना होगा। प्रशासनिक पारदर्शिता और जनभागीदारी का यह संतुलन ही रायपुर और बिलासपुर को राष्ट्रीय पटल पर स्वच्छता का सच्चा मॉडल बना सकता है।