राज्योत्सव के शिल्पग्राम में रेशम उत्पादन की प्रक्रिया बनी आकर्षण, किसानों को मिल रही योजनाओं की जानकारी
सफेद, रंगीन और पीला मैसूर कोसा सहित रेशम की विभिन्न किस्मों का प्रदर्शन, शहतूत की खेती और कीटपालन के लिए किसानों को दिया जा रहा प्रशिक्षण
रायपुर, राज्योत्सव परिसर के शिल्पग्राम में ग्रामोद्योग विकास विभाग का रेशम उत्पादन स्टॉल लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां किसान और आम नागरिक रेशम कीटपालन की प्रक्रिया को करीब से समझने पहुंच रहे हैं। प्राकृतिक रेशम के कीड़ों को देखने के साथ लोग अलग-अलग किस्म के कोसा और उनसे तैयार होने वाले धागों के बारे में भी जानकारी ले रहे हैं।
स्टॉल में मलबरी सफेद कोसा, रंगीन कोसा, पीला मैसूर, मलबरी सफेद रिल्ड, टसर स्पन और बाना धागा, डाबा पालित कोसा सहित रेशम की कई किस्में प्रदर्शित की गई हैं। इन धागों का उपयोग कोसा और मलबरी सिल्क के अलावा बनारसी तथा कांजीवरम जैसी पारंपरिक साड़ियों के निर्माण में किया जाता है। यहां आने वाले लोग रेशम उत्पादन से लेकर वस्त्र निर्माण तक की प्रक्रिया को समझ रहे हैं।
स्टॉल पर टसर धागा विक्रय केंद्र भी बनाया गया है, जहां प्रदेश के अलग-अलग जिलों के विशेष सिल्क उत्पाद प्रदर्शित किए गए हैं। इनमें सारंगढ़ का समलेश्वरी मलबरी और टसर सिल्क, सरगुजा का महामाया सिल्क, जगदलपुर का दंतेश्वरी सिल्क, कांकेर का अरण्य सिल्क, महासमुंद का खल्लारी सिल्क, रायगढ़ का फॉरेस्ट गोल्ड सिल्क, गरियाबंद का गंडेश्वर सिल्क और जांजगीर-चांपा का चांपा सिल्क शामिल हैं। इसके अलावा टसर बीजागर और स्पिनिंग मशीन के जरिए धागा तैयार करने की प्रक्रिया का प्रदर्शन भी किया जा रहा है।
किसानों को निजी भूमि पर शहतूत की खेती और रेशम कीटपालन को बढ़ावा देने के लिए संचालित नवीन शहतूत रेशम बाड़ी योजना की जानकारी दी जा रही है। इसके तहत एक एकड़ भूमि में शहतूत के पौधे लगाने और कीटपालन को प्रोत्साहित किया जाता है। योजना में पौधरोपण एवं रखरखाव, कीटपालन भवन, उपकरण और सिंचाई सुविधाओं के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है। साथ ही किसानों को शहतूत की खेती और रेशम कीटपालन की तकनीक समझाने के लिए एक महीने का निःशुल्क प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
शहतूत रेशम कीटपालन कृषि आधारित कुटीर उद्योग है, जिसे किसान खेती-किसानी के साथ अपना सकते हैं। श्रम आधारित होने के कारण इस गतिविधि से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। विभाग का उद्देश्य लघु एवं सीमांत किसानों को रेशम उत्पादन से जोड़कर ग्रामीण आजीविका के नए साधन विकसित करना है।