औषधीय खस की खेती से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती परखंदा की महिलाएं, पहली फसल से 1.12 लाख की आय
रायपुर, पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर धमतरी जिले के कुरुद विकासखंड के ग्राम पंचायत परखंदा की महिलाओं ने औषधीय और सुगंधित फसल खस की खेती को अपनाकर आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश की है। सेवा संकल्प अभियान के तहत ‘धान के कटोरा उत्पादक समिति’ स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने 2.50 एकड़ में खस की खेती की और पहली ही फसल में 11.20 क्विंटल उत्पादन प्राप्त कर 1 लाख 12 हजार रुपये की आय अर्जित की।
खस एक औषधीय और सुगंधित पौधा है, जिसकी जड़ों से निकलने वाले तेल का उपयोग इत्र, साबुन, शरबत, पान मसाला, तंबाकू और सौंदर्य उत्पादों सहित विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है। इसकी औषधीय उपयोगिता के कारण आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी इसका इस्तेमाल होता है। परखंदा की महिलाओं ने खेती में विविधता लाने और आय के नए स्रोत विकसित करने के उद्देश्य से खस की खेती का प्रयोग शुरू किया।
नई फसल होने के बावजूद समूह की महिलाओं ने सामूहिक श्रम, नियमित देखभाल और आपसी सहयोग से खेती को सफल बनाया। पहली फसल से मिली 1.12 लाख रुपये की आय ने महिलाओं का उत्साह बढ़ाया और उन्हें विश्वास दिलाया कि उपलब्ध भूमि और स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग कर कृषि आधारित आजीविका को मजबूत किया जा सकता है। समूह अब खस के साथ हल्दी की खेती भी कर रहा है, जिससे आय के अतिरिक्त विकल्प विकसित हो रहे हैं।
परखंदा में आजीविका के साथ पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है। योजनांतर्गत 6 एकड़ क्षेत्र में मिश्रित वृक्षारोपण किया गया है। इससे हरित क्षेत्र और जैव विविधता को बढ़ावा देने के साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए कृषि आधारित गतिविधियों को विस्तार देने का अवसर मिल रहा है। औषधीय खेती और वृक्षारोपण का यह संयोजन पर्यावरण संरक्षण के साथ आजीविका संवर्धन का मॉडल प्रस्तुत कर रहा है।
परखंदा की महिलाओं की यह पहल केवल खस की खेती और आय तक सीमित नहीं है, बल्कि सामूहिक प्रयास, फसल विविधीकरण और महिला सशक्तिकरण की कहानी भी है। खस की पहली फसल से मिली सफलता के बाद समूह अब उत्पादन, मूल्यवर्धन और बेहतर विपणन के जरिए अपनी आय बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह पहल बताती है कि नई सोच और सामूहिक प्रयास से ग्रामीण महिलाएं खेती को आत्मनिर्भरता और आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत माध्यम बना सकती हैं।